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Mera Fauji Calling Review: पिता की राह तकती बिटिया की भावुक कहानी, ‘शोले गर्ल’ का दमदार अभिनय

 




Movie Review: मेरा फौजी कॉलिंग

कलाकार: शरमन जोशी, बिदिता बाग, जरीना वहाब, माही सोनी और विक्रम सिंह आदि।

लेखक, निर्देशक: आर्यन सक्सेना

रेटिंग: **1/2



देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह किसी फिल्म का ट्रेलर जारी करें तो समझ यही आता है कि फिल्म किसी फौजी के शौर्य या बलिदान की कहानी होगी। फिल्म का पोस्टर भी यही बताता है। यहां तो फौजी भी दो दो हैं। फिल्म ‘मेरा फौजी कॉलिंग’ एक अच्छी फिल्म है। लेकिन, इसका प्रचार प्रसार जिस नजरिये से किया गया है वह अलग पैकेजिंग में निकली एक अलग ही विषय वस्तु है। फिल्म की पृष्ठभूमि, इसकी कथा वस्तु और इनके चरित्रों के अनुसार अगर इसके कलाकारों की महीना दो महीना वर्कशॉप हुई होती तो ये फिल्म कमाल की हो सकती थी। फिल्म में बिदिता बाग ने फिर एक बार साबित किया कि वह किसी फिल्म का मजबूत स्तंभ हो सकती है। हिंदी सिनेमा के दिग्गज निर्देशकों को इस काबिल अदाकारा पर नजर डालनी ही चाहिए। वह तापसी पन्नू, यामी गौतम और अदिति राव हैदरी की टक्कर की अभिनेत्री हो चुकी हैं।

‘मेरा फौजी कॉलिंग’ दरअसल कहानी एक छोटी बच्ची की है। इस बच्ची की मां है। और, उसकी एक दादी है। बच्ची का पिता सरहद पर है। धमाकों के बीच भी घर पर फोन करना नहीं भूलता। लेकिन, बच्ची को पिता के संताप से बचाने के लिए एक दुनिया उसके आसपास के लोग गढ़ना शुरू कर देते हैं और तभी कहानी में एंट्री होती है एक और फौजी की। पुरानी फिल्मों के आप शौकीन रहे हैं तो आपको ऋषि कपूर, दिव्या भारती और शाहरुख खान की फिल्म ‘दीवाना’ यहां याद आ सकती है। अपने को खोने का गम भी सीने में सुलगाए रखना और चेहरे पर सामने वाली की इनायत का एहसान भी जताए रखना, दोनों एहसास एक साथ जीना आसान नहीं होता।

फिल्म ‘मेरा फौजी कॉलिंग’ को अगर उस छोटी सी बच्ची के हिसाब से प्रचारित किया जाता तो एक बेटी की अपने पिता के लिए तड़प की ये बेहतरीन फिल्म बन सकती थी। फिल्म को बनाया भी इसी हिसाब से जाना चाहिए था। माही सोनी ने इस बच्ची के किरदार में कमाल किया है। और, बिदिता बाग तो हैं ही इमोशन्स की मास्टर। रंगमंच के सभी नौ रस वह सिनेमा में जी चुकी हैं। उनकी मौजूदगी का एक अलग आभा मंडल होता है। ‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’ और ‘शोले गर्ल’ जैसी फिल्में करने वाली बिदिता बाग की जगह उन तमाम अभिनेत्रियों से आगे की है जो किसी न किसी खास निर्देशक की बगलगीर होकर अगली कतार में पहुंच चुकी हैं।

अभिनेता शरमन जोशी का काम भी काबिले तारीफ है। वह बहुत ही सहज अभिनेता है। रोल की खाल में जीना उनको आता है। दादी के रोल में जरीना वहाब ने अपना अनुभव यहां साझा किया है। रांझा विक्रम सिंह को अगर सिनेमा में आगे कुछ बड़ा करना है तो उन्हें अपनी टीम मजबूत बनानी चाहिए। और लगकर मेहनत करनी चाहिए। जज्बा हो तो रणवीर सिंह जैसे शुरूआती दौर के नॉन एक्टर भी आगे चलकर कमाल के अभिनेता बने हैं। बाकी कलाकारों ने भी अपने अपने हिसाब से अपना काम बखूबी कर दिखाया है।

फिल्म ‘मेरा फौजी कॉलिंग’ की तकनीकी टीम फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी है। एक तो फिल्म के निर्देशक आर्यन सक्सेना ने अपनी कहानी पर जैसी फिल्म बनाने की कोशिश की है, उसकी तारीफ कथ्य के हिसाब से तो की जा सकती है, लेकिन फिल्म की पटकथा और इसके संवादों में बहुत काम करना बाकी रह गया है। सिनेमैटोग्राफी में मेहनत की गई है। लेकिन, ये फिल्म को सहज नहीं बना पाती। फिल्म देखते समय फिल्म देखने का गुमान न रहना ही असली सिनेमैटोग्राफी है। फिल्म की एडीटिंग भी चुस्त होनी चाहिए थी। दर्शकों के बदलते मिजाज के हिसाब से ये फिल्म कम से कम बीस मिनट और छोटी की जा सकती है। फिल्म का संगीत बहुत कमजोर है। ऐसी फिल्म में कम से कम एक दो गाने तो दमदार होने ही चाहिए थे।



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